कहाँ था मैं, और कहाँ जाना था, और कहाँ पहुँच गया।
क्या करना था, और क्या किया, और क्या हो गया।
कोई तब भी नहीं था, और कोई अब भी नहीं है।
किसी से बात तब भी नहीं की, और अब कोई बात करने वाला भी नहीं है।
अब कहाँ जाना है, या बस जाना है— ये भी नहीं पता।
जा तो रोज़ रहे हैं, लेकिन कहाँ जा रहे हैं, ये अक्सर वहाँ पहुँचने के बहुत देर बाद पता चलता है।
शायद ज़िंदगी ऐसी ही है— चलते रहो, बिना जाने कि रास्ता कहाँ ले जाएगा।
लेकिन प्रभु, अब थक गया हूँ हर बार पहुँचकर यह समझने से कि मुझे जाना तो कहीं और था।
अब बस इतनी-सी इच्छा है आपसे— मुझे पूरी ज़िंदगी का जवाब नहीं चाहिए, मुझे मंज़िल भी नहीं चाहिए।
बस एक रास्ता दिखा दीजिए।ऐसा रास्ता, जिस पर पहला कदम रखते ही दिल को यक़ीन हो जाए कि इस बार मैं भटक नहीं रहा।
और अगर रास्ता बहुत लंबा हो, तो चलने की हिम्मत दे देना।
अगर रास्ता अकेला हो, तो साथ होने का एहसास दे देना।
और अगर फिर भी कुछ समझ न आए, तो बस इतना कर देना— अँधेरे में एक छोटी-सी रोशनी छोड़ देना, जिसके पीछे चलते-चलते मैं खुद तक वापस पहुँच जाऊँ।
प्रभु, अब कुछ नहीं माँगता।
बस एक रास्ता। एक सही रास्ता। और उस रास्ते पर चलने की हिम्मत।— Aditya Ranjan