विकास और किस्मत
उस दिन बनारस के एक घाट पर खड़ा था।
सामने गंगा बह रही थी और उसके उस पार एक ऐसा किनारा था, जहाँ लगभग कुछ भी नहीं था।
न चमकती रोशनियाँ, न भीड़, न बड़ी-बड़ी सीढ़ियाँ, न दुकानों की कतार।
मैं कुछ देर तक बस उस किनारे को देखता रहा।
फिर मन में एक सवाल आया—
"इसे छोड़ क्यों दिया गया?"
नदी तो वहाँ भी थी। सूरज वहाँ भी उगता था। हवा वहाँ भी चलती थी। और इस पार से उस पार जाने के लिए बस एक नाव चाहिए थी।
फिर ऐसा क्या हुआ कि बनारस इस तरफ़ बसता चला गया और वह किनारा पीछे छूटता चला गया?
एक फैसला जो सब बदल देता है
शायद कभी किसी ने तय किया होगा— "शहर इधर बनेगा।"
बस एक फैसला।
फिर यहाँ घाट बने। घाटों पर सीढ़ियाँ बनीं। सीढ़ियों पर लोग आए। लोगों के साथ दुकानें आईं, रोशनियाँ आईं, कारोबार आया और धीरे-धीरे इतिहास ने भी अपना घर इसी किनारे पर बना लिया।
और उधर?
उधर शायद वही नदी थी। वही मिट्टी थी। वही आसमान था।
लेकिन विकास नहीं पहुँचा।
मैं सोचने लगा — क्या सच में उस किनारे की किस्मत में इतना ही था?
या फिर कभी किसी ने जान-बूझकर नहीं, बस एक छोटा-सा फैसला लेकर उसे दूसरी तरफ़ छोड़ दिया था?
दो किनारों की अजीब कहानी
कितनी अजीब बात है।
कभी-कभी दो जगहों के बीच दूरी बहुत बड़ी नहीं होती।
बस एक नदी का फासला होता है।
फिर भी एक किनारा शहर बन जाता है और दूसरा किनारा — इंतज़ार।
ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है
शायद ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है।
दो लोग एक ही जगह से चल सकते हैं। एक ही सपने देख सकते हैं। एक जैसी मेहनत कर सकते हैं।
लेकिन किसी मोड़ पर किसी एक को एक नाव मिल जाती है।
और दूसरा उसी किनारे खड़ा रह जाता है।
हम उसे देखकर कहते हैं—
"शायद उसकी किस्मत में नहीं था।"
लेकिन कौन जानता है?
शायद किस्मत नहीं थी। शायद मौका नहीं मिला। शायद किसी ने रास्ता नहीं बनाया। या शायद बस किसी ने कभी यह सोचा ही नहीं कि—
"उस पार भी कुछ बनाया जा सकता है।"
वापस उस किनारे की तरफ़
उस दिन मैं उस किनारे को देखकर यही सोचता रहा।
नदी दोनों तरफ़ थी।
फासला भी बहुत ज़्यादा नहीं था।
फिर भी दोनों किनारों की कहानी इतनी अलग कैसे हो गई?
शायद हर अनदेखे किनारे की कहानी यही होती है—
उसे शहर बनने के लिए नदी पार नहीं करनी थी, बस किसी को उसकी तरफ़ देखने की ज़रूरत थी।
अगर यह पढ़कर कुछ महसूस हुआ, तो ज़रूर बताइए। शायद आपके मन में भी ऐसा कोई किनारा हो।