दिल्ली से गुरुग्राम तक

कॉलेज खत्म होने के बाद पहली बार दिल्ली आया था।
कॉलेज की जिंदगी कितनी अलग होती है, यह शायद तब तक समझ नहीं आता जब तक उससे बाहर नहीं निकलते।
कॉलेज में एक छोटी-सी दुनिया होती है।
कुछ दोस्त होते हैं।
एक तय दिनचर्या होती है।
कहाँ जाना है, किससे मिलना है, किसके साथ बैठना है—सब कुछ लगभग तय होता है।
और सबसे बड़ी बात—
आपको पता होता है कि अगर कुछ गलत हुआ, तो आपके पास अपने लोग हैं।
मेरे लिए भी कॉलेज की दुनिया कुछ ऐसी ही थी।
कॉलेज अमृतसर में था।
फिर पढ़ाई खत्म हुई और नौकरी के लिए दिल्ली आना पड़ा।
नौकरी की लोकेशन गुरुग्राम में थी।
मैं दिल्ली में रहता था और रोज़ लगभग एक घंटे का सफर करके गुरुग्राम जाना पड़ता था।
मेरे साथ कॉलेज का एक दोस्त भी था।
वही दोस्त जो कॉलेज से ही मेरा support system रहा था।
इसलिए शुरुआत में सब ठीक लग रहा था।
लेकिन कुछ दिनों बाद मुझे गुरुग्राम में एक हॉस्टल मिल गया।
अब वहाँ shift होना था।
और यहीं से मेरे अंदर कुछ बदलने लगा।
जिस दिन मुझे दिल्ली का कमरा छोड़कर गुरुग्राम जाना था, मैं अपना सामान पैक कर रहा था।
कमरे में रखी छोटी-छोटी चीज़ों को देखते हुए अचानक बहुत सारे सवाल दिमाग में आने लगे।
"अगर नया roommate अच्छा नहीं हुआ तो?"
"अगर उसने मेरे साथ adjust नहीं किया तो?"
"अगर मुझे वहाँ बिल्कुल अकेलापन महसूस हुआ तो?"
"मैं एक नए शहर में अकेले कैसे रहूँगा?"
जितना सोचता, उतना डर बढ़ता जाता।
अजीब बात यह थी कि अभी तक कुछ हुआ ही नहीं था।
न roommate से मिला था।
न हॉस्टल की जिंदगी शुरू हुई थी।
लेकिन मेरा दिमाग पहले ही उन सभी समस्याओं का हल ढूँढने में लगा हुआ था जो शायद कभी आने वाली ही नहीं थीं।
मैंने अपना आखिरी सामान उठाया और दिल्ली के उस कमरे से बाहर निकल गया।
दरवाजा बंद करते समय मन में एक अजीब-सा खालीपन था।
ऐसा लग रहा था जैसे मैं सिर्फ एक कमरा नहीं छोड़ रहा हूँ।
मैं अपनी पुरानी जिंदगी छोड़ रहा हूँ।
कॉलेज की जिंदगी।
दोस्त।
अपनापन।
वह छोटी-सी दुनिया जहाँ सब कुछ जाना-पहचाना था।
अब आगे सिर्फ एक नया शहर था।
और अनजान लोग।
सफर
मैं मेट्रो में बैठ गया।
दिल्ली से गुरुग्राम की तरफ।
मन अभी भी उन्हीं सवालों में उलझा हुआ था।
Stress इतना था कि मैंने अपने बैग से chocolate निकाली और खुद खाने लगा।
शायद उस समय मुझे chocolate से ज्यादा किसी ऐसी चीज़ की जरूरत थी जो थोड़ी देर के लिए मेरा ध्यान उन विचारों से हटा दे।
तभी मेरी नजर बगल में बैठी एक लड़की पर पड़ी।
वह आराम से किताब पढ़ रही थी।
न उसे मेरी चिंता पता थी।
न मेरे नए शहर की कहानी।
न मुझे उसके बारे में कुछ पता था।
बस एक अनजान इंसान।
पता नहीं उस समय मेरे दिमाग में क्या आया।
मैं chocolate खा ही रहा था, तो मैंने उसे भी chocolate offer कर दी।
उसने पहले मुझे देखा।
फिर chocolate को।
और फिर ले ली।
बस वहीं से बातचीत शुरू हो गई।
हमें क्या-क्या बातें हुईं, आज मुझे ठीक से याद भी नहीं।
लेकिन इतना याद है कि कुछ देर बाद मैं अपनी चिंता भूल चुका था।
जो दिमाग कुछ देर पहले तरह-तरह की possibilities बना रहा था—
अब बस एक अनजान इंसान से बात कर रहा था।
कुछ देर पहले मुझे लग रहा था कि मैं इस बड़े शहर में बिल्कुल अकेला हूँ।
लेकिन उस छोटे-से सफर में मुझे एहसास हुआ—
शायद मैं उतना अकेला था ही नहीं, जितना मेरा दिमाग मुझे बता रहा था।
हॉस्टल और नई शुरुआत
गुरुग्राम पहुँचा।
हॉस्टल पहुँचा।
Roommate से मिला।
और मेरी एक और चिंता वहीं खत्म हो गई।
वह अच्छा इंसान था।
हम आसानी से adjust हो गए।
जिस roommate को लेकर मैं रास्ते भर डर रहा था, वह समस्या बना ही नहीं।
मैंने उस रात सोते हुए सोचा—
सुबह तक मेरे पास कितने सवाल थे।
और शाम तक उनमें से ज्यादातर सवालों का कोई मतलब ही नहीं रह गया था।
तब समझ आया—
हम अक्सर उन चीज़ों से डरते हैं जो अभी हुई ही नहीं हैं।
हमारा दिमाग खाली जगहों को डर से भर देता है।
"क्या होगा?"
"अगर ऐसा हुआ तो?"
"अगर वैसा हो गया तो?"
और धीरे-धीरे हम उस भविष्य की समस्याओं से परेशान होने लगते हैं, जो शायद कभी आएगा ही नहीं।
उस दिन दिल्ली से गुरुग्राम तक का सफर सिर्फ एक शहर से दूसरे शहर का सफर नहीं था।
वह मेरे लिए कॉलेज से जिंदगी की तरफ पहला कदम था।
कॉलेज की छोटी और सुरक्षित दुनिया से निकलकर एक ऐसी दुनिया में कदम रखना, जहाँ सब कुछ पहले से तय नहीं था।
जहाँ आपको खुद नए लोग ढूँढने हैं।
खुद नए रिश्ते बनाने हैं।
खुद uncomfortable situations में रहना सीखना है।
और सबसे जरूरी—
खुद अपने डर के साथ रहना सीखना है।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस दिन मुझे गुरुग्राम जाने से उतना डर नहीं लग रहा था, जितना अपने दिमाग में बनाई हुई कहानी से लग रहा था।
मुझे नहीं पता था कि roommate कैसा होगा।
मुझे नहीं पता था कि नया शहर कैसा होगा।
मुझे नहीं पता था कि मैं वहाँ अकेला महसूस करूँगा या नहीं।
लेकिन मैं एक बात सीख गया—
हर अनजान चीज़ बुरी नहीं होती।
कभी-कभी stress में खाई जा रही एक chocolate किसी अनजान इंसान के साथ बातचीत शुरू कर देती है।
कभी-कभी एक अनजान roommate अच्छा दोस्त बन जाता है।
और कभी-कभी जिस रास्ते पर जाने से हम सबसे ज्यादा डरते हैं, वही रास्ता हमें बड़ा कर देता है।
शायद जिंदगी का यही तरीका है।
वह पहले रास्ता दिखाती है।
फिर डराती है।
और अंत में सिखाती है—
"इतना भी मत डरो। तुम सोच से कहीं ज्यादा संभाल सकते हो।"